Sunday, July 18, 2010

राहुल गाँधी ne rajniiti को क्या एक नई दिशा दे दी?

राहुल गाँधी के सम्बन्ध अनेक लेख लिखे जा चुके हैं और अधिकांश लेखों में उनको परिवारवाद की एक कड़ी के रूप में देखने कोशिश की गई है। किसी आलोचक ने उनको राजकुमार के रूप में भी दर्शाने की कोशिश की तो, किसी ने उनपर प्रचारवाद के पोषक होने का भी आरोप लगाया। लेकिन राहुल गाँधी ने राजनीति में एक ऐसा भूचाल ला दिया है क़ि उनके राजनीतिक विरोधी खासे परेशान हो उठे हैं।

देश के जातिवादी नेता और पार्टियां खौफ में हैं। उनका दलितों के यहाँ जाना, ठहरना, उनके साथ भोजन करना, ग़रीबों की बात को बिना लाग लपेट के कहना, दलितों को लुभाने लगा है। यह बाद की बात है क़ि वे दलितों के लिए क्या कर पाते हैं और क्या नहीं कर पाते हैं, लेकिन उनके गरीब -दर्शन ने जातिवादियों की नीति और राजनीतिक समीकरण को बदलना शुरू कर दिया है।

मायावती ने दलितों को अपनी और करने के बाद, ब्राह्मणों को रिझाना शुरू कर दिया था, लेकिन जैसे ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जनाधार बढ़ना शुरू हुआ, मायावती ने अपने दल के उन सभी नेताओं के पर क़तर दिए जो सवर्ण हैं। पार्कों में अपनी प्रतिमा बनवाने का काम धीरे कर, उन्होंने दलितों के ऊपर ध्यान देना शुरू कर दिया और जोर दे कर कहने लगीं हैं क़ि उनकी पार्टी की कमान हमेशा दलितों के हाथ में रहेगी।

मुलायम सिंह यादव को पिछड़ों की चिंता सताने लगी है। उनको मुस्लिम समुदाय की चिंता भी सताने लगी है। वे अब विनीत स्वर में माफ़ी भी मांगने लगे हैं क़ि उन्होंने बाबरी मस्जिद कांड के एक आरोपी , कल्याण सिंह को अपनी पार्टी में शामिल कर बहुत बड़ी भूल कर दी। इसके पहले उन्होंने सवर्ण नेता अमर सिंह को अपनी पार्टी से चलता कर दिया। इन सब के पीछे राहुल इफेक्ट ही काम कर रहा है। विगत चुनाओं में मुस्लिम वोटों का रुझान उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की तरफ होता दिखा । ऐसे में तो मुलायम सिंह का राजनीतिक आधार ही समाप्त हो जायेगा, इस लिए कल्याण सिंह के सम्बन्ध में उन्होंने माफ़ी मांग कर, अपने मुस्लिम समर्थकों को बचाने की कोशिश की है।

राहुल गाँधी ने युवा कांग्रेस में जब से दबंगों की जगह पढ़े लिखे युवकों को लाना शुरू कर दिया है, दूसरे दलों ने भी राजनीती से आपराधिक चरित्र वाले राजनेताओं और युवा नेताओं को निकलना शुरू कर दिया है। राहुल इफेक्ट का यह सबसे बड़ा कमाल है।
इन सब प्रभाओं के बावजूद क्या कांग्रेस से दबंग नेतोओं का पलायन हो जायेगा, ऐसा नहीं लगता है। कांग्रेस में भी जातिवादी लोग हैं। उनके अपने अपने ग्रुप हैं। उनके बीच खूब गहरी जोर आजमाइश चलती है। क्या इन तथ्यों से राहुल गाँधी अवगत नहीं हैं?
राहुल गाँधी को अपनी पार्टी क़ि छवि भी बदलनी चाहिए। यह आसान काम नहीं है।
भारतीय राजनीति को कुछ दिनों में बदल देना आसन नहीं है। इसके लिए कई जिंदगियों की जरूरत होगी। यहाँ जैसी परंपरा बन गई है उसकी जडें बहुत गहरी है।
जातिवाद को मिटने में सबसे बड़ी बाधा वर्ण आधारित रिजर्वेशन है। लेकिन हमारा संविधान इसके समर्थन में है और बहुत हद तक यह ठीक भी है। जिन जातियों को दो हजार सालों तक कुचल कर रखा गया है उनको रिजर्वेशन मिलनी चाहिए। लेकिन इस संवैधनिक व्यवस्था ने भारत में जातिवाद की जड़ों को और मजबूत कर दिया है, यह भी एक कटु सच है।

क्या राहुल गाँधी जातिवाद से निपट पायेंगें? अगर उन्होंने इस दिशा में कुछ भी ठोस कर दिखाया तो वे एक बड़े नेता के रूप में ही नहीं बल्कि एक समाज सुधारक के रूप में भी जाने जायेंगे.